Friday, 12 February 2010
पढ़ाई बंद कराने के लिए ससुराल में अत्याचार, तलाक भी न मिला
सीद्धांत में लड़की होना भले ही गर्व की बात हो, प्रकृति और ईश्वर का उपहार भी हो, लेकिन समाज में जो हकीकत है, वह तो अधिकतर लड़कियों के लिए कतई सुखद नहीं है। मैंने अपनी अब तक की जिंदगी में आंसू भरी जो राह तय की है, उसके अनुभव के आधार पर यह सब लिख रही हूं। मैं पढ़ना चाहती थी। मां-बाप का सहारा बनना चाहती थी। अपने सपने पूरा करना चाहती थी, परंतु हालात, घिसे-पिटे रिवाज या किस्मत ने सब पर पानी फेरने की कोशिश बार-बार की। जब मैं वर्ष 13 वर्ष की थी, वर्ग 8 में पढ़ती थी। मेरे पिता की तबीयत खराब हो गयी। वे बीमारी के साथ-साथ इस चिंता से परेशान थे कि उनके बाद बेटी का क्या होगा? लिहाजा, पढ़ाई जारी रखने के वादे के साथ मेरी शादी करा दी गयी। उस समय लड़के वाले कहते थे कि मैं लड़की को पढ़ाऊंगा। शादी के बाद ससुराल वाले पलट गए। खुद लड़के यानी मेरे पति ने कहा कि लड़की अब पढ़ कर क्या करेगी? लड़की को तो शादी के लिए ही पढ़ाया जाता है। अब तो इसकी शादी हो गयी। अब क्या जरूरत है इसे पढ़ाने की? इस वादाखिलाफी और कुतर्क ने मुझे रुला दिया। मेरा सपना था कि पढ़-लिख कर कुछ बनूंगी, मगर मेरे पैर में (धोखे से) जंजीर बांध दी गई थी। पढ़ाई बंद हो गयी। फिर भी मैं न तो निराश हुई, न हार मानी। इसके चलते शुरू हुआ शारीरिक उत्पीड़न का दौर। ससुराल वाले और पति (जिसे परमेश्वर बताया जाता है) मुझे बहुत सताते थे, मारते थे। आखिर एक दिन मुझे घर से निकाल दिया गया। मैं बहुत रोयी, मगर उन पर मेरे आंसुओं का कोई असर नहीं हुआ। मैंने मां को खत लिख कर आपबीती बतायी और कहा कि यह भी कोई जिंदगी है? मैं पढ़ना चाहती थी तो मेरी शादी हो गयी। अब मेरे साथ इतना जुल्म हो रहा है। इससे अच्छा होगा कि मैं मर जाऊं। ऐसी दुखदायी चिट्ठियां लिखने की नौबत हमारे समाज में बहुत सी लड़कियों की जिंदगी में आती है। कई बार मायके वाले इसे हल्के में लेते हैं और उधर ससुराल में लड़की मार दी जाती है या उसे आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया जाता है। किस्मत ने कुछ साथ दिया कि मेरी मां ने खत पढ़कर मुझे बुला लिया। मैं फिर से पढ़ने लगी। ससुराल वालों ने यहां चैन से जीने नहीं दिया। अब फिर मुझे स्कूल जाते समय रास्ते में मारा पीटा जाने लगा। तरह-तरह के ताने दिये जाने लगे। एक दिन तो रास्ते में मेरे पति ने मुझे बहुत मारा। पब्लिक ने बचाया। तंग आकर मैंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तलाक (डिर्भोस) लेने के लिए अर्जी दी। उधर पढ़ाई जारी रखी। किसी तरह से मैं आठवीं और नवमी कक्षा पास कर पायी। उसके बाद करीब दो वर्ष केस चला। अदालत ने मुझे अच्छी तरह से रखने और दसवीं पास कराने के ससुराल वालों के आश्वासन पर विश्वास कर विवाह बंधन बचाने का मौका दिया। मुझे फिर ससुराल आना पड़ा,लेकिन अदालत की परवाह किये बिना फिर मेरे साथ वही सब हुआ। पहले की तरह लड़का (जिसे पति कहने का जी नहीं करता) मारने-पीटने लगा। पुरुष होने के दंभ में वह मुझे कोसने लगा कि पढ़ाई कर मुझसे आगे निकला चाहती है। मैं हर दुख सहती रही। इसी तनाव भरे दौर में मैंने बेटी और बेटे को जन्म दिया। वे दो बच्चों के पिता बन कर भी नहीं सुधरे। मैं फिर अलग हुई। अपनी जिंदगी सुधारने के लिए दसवीं कक्षा में पढ़ने लगी। अब वह मेरे घर पर आकर मुझे और मेरी मां तक को मारने लगा, पापा तो पहले ही मर गये थे। कुछ लोगों के बहुत समझाने पर वह अपने बेटे को लेकर भाग गया, लेकिन बेटी को छोड़ गया। यह भी पुरुषवादी सोच का नतीजा था। मैं बेटी को लेकर मायके में रहने लगी। उसके बाद मैं जब दसवीं का टेस्ट दे रही थी, उसने फिर मुझे बहुत रोकने की कोशिश की।मैं नहीं रुकी। अच्छी श्रेणी में आने का सवाल ही नहीं था। थर्ड डिवीजन ही सही, मैं मट्रिक पास कर गई। यह परीक्षा जिंदगी के कठिन सवाल हल करते हुए दी गई थी, इसलिए मेरा यह डिवीजन किसी फर्स्ट क्लास से कम नहीं है। अब मैं आई.काम में प्रथम वर्ष में पढ़ाई कर रही हूं। कुछ बनना चाहती हूं। अपने बच्चों को कुछ बनाना चाहती हूं। मजदूरी करके अपनी बच्ची की परवरिश कर रही हूं। सभ्य समाज, अदालत, कानून और सरकार के बावजूद मेरा संघर्ष तो लगभग तन्हा है। कुछ न कुछ गम तो सबको मिलता है, लेकिन जीवन तो चलने का नाम है। मैं भगवान से विनती करती हूं कि वे मुझे आगे बढ़ने की शक्ति दें। मैं नदी की तरह बहती जाऊंगी, राह रोकने वाले ईंट-पत्थरों को हटाते-मिटाते हुए। भरोसा है, एक दिन अपनी मंजिल को जरूर पाऊंगी। 09 FEB 2010
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