Wednesday, 24 February 2010
उस दिन सवालों का सागर उमड़ पड़ा था
ब से मैंने होश सम्भाला है, मैं बस यही सुनती आई कि हमारे परिवार में लड़के और लड़की के बीच कोई अन्तर नहीं है। दोनों हमारे लिए बराबर हैं। ये कहना था मेरे माता-पिता का और मैंने उसे आंखें बन्द कर मानने की कोशिश भी की। पर न जाने क्यों वो कहते कुछ थे पर करते कुछ और। एक लड़की होने के नाते मुझे कई छोटी-छोटी बातों पर डांट खानी पड़ती। फिर मैंने मान लिया की शायद यही दुनिया की रीति है। और फिर मेरे माता-पिता मेरा बुरा तो नहीं ही सोचेंगे। यहीं पर मैं गलत थी। एक दिन की बात है जब मैं नौंवीं कक्षा में पढ़ती थी। अपने दोस्तों को जीन्स पहने देखती तो मेरे मन में भी इच्छा हुई कि एक बार मैं भी इसे पहनूं। मैं सलवार-कमीज में आत्मविश्वास नहीं महसूस कर पाती थी। मैंने अपनी अभिलाषा पिता जी के समक्ष रखी। उनका जवाब था-अभी नहीं, जब तुम्हारी शादी हो जाएगी तब सारे शौक पूरे कर लेना। खैर, इतना कह कर पापा तो वहां से चले गए पर मेरे अंदर सवालों का सागर उमड़ पड़ा। एक लड़की को शादी के पहले अपने माता-पिता के इशारों पर चलना है, शादी के बाद पति के मनमाफिक और बाद में सयाने हो चुके बच्चों की इच्छा के अनुसार। वह आखिर अपना जीवन अपनी मर्जी से जीती कब है? जब मैंने तो आज तक नहीं देखा पापा को अपनी पत्नी (अर्थात मेरी मां) की इच्छा पूरी करते हुए, तो मैं कैसे विश्वास करूं कि कोई पुरुष पति बनने पर मेरी इच्छाएं भी कभी पूरी करेगा? फिर सुबह हुई, मेरी नई जिन्दगी की और उस सुबह की पहली किरण को साक्षी मान कर मैंने प्रण लिया कि भले ही मेरी सारी इच्छाएं पूरी न हो पर मैं लड़ूंगी। बारहवीं की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के उपरान्त मेरे माता-पिता मुझे डाक्टर बनाना चाहते थे क्योंकि वह लड़कियों के लिए सुरक्षित होता है पर मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में जाना चाहती थी। उन्होंने तीखा विरोध किया। मैंने सोचा अगर आज मैं रुकी तो शायद फिर कभी नहीं बढ़ पाऊंगी और न जाने वो कौन सी शक्ति थी, जिसने मेरे आगे, लगातार महीनों चली बहस के आगे मेरे घर वालों को झुका दिया। लेकिन मैं जानती हूं, ये अंत नहीं है। आगे, फिर मेरे माता-पिता मार्केट सेफ्टी का सवाल लेकर मेरे कदमों को रोकने का प्रयास करेंगे। पर अब मैं तैयार हूं और मैं जीवन में बहुत आगे जाना चाहती हूं ताकि एक दिन अपने घरवालों से और दुनिया वालों से गर्व से कह सकूं हीरा अगर है बेटा, तो सच्चा मोती होती हैं बेटियां। 21 feb Bhagalpur
Thursday, 18 February 2010
तन ढकने तक का पैसा नहीं फिर भी कालेज में पढ़ती हूं
हां, मैं एक लड़की हूं। इसका मतलब ये नहीं की मैं आगे नहीं बढ़ सकती हूं। मैं और मेरा परिवार बहुत गरीब है। पढ़ाई जारी रखने में असमर्थ हूं लेकिन मैं आगे बढ़ना चाहती हूं। मेरे पिता भी मुझे पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन वो क्या करें। उनके पास तो इतना भी नहीं कि वो मेरे तन को ढकें। आज मैं इस प्रतियोगिता में अपने दिल की बात लिखना चाहती हूं। अपनी कहानी सबको बताना चाहती हूं। मुझे नहीं पता कि मैं आज जीत पाऊंगी या नहीं, लेकिन इतनी तो खुशी अवश्य मिलेगी कि आज जो दुनिया को पता नहीं था, वह चुभता सच मैं सबके पास पहुंचाने में समर्थ रहूंगी। सबको पता चलना ही चाहिए कि एक स्त्री, जिसके पास तन ढकने के लिए कपड़ा नहीं था, वह आज एक कालेज में पढ़ रही है। जब मैं छ: साल की थी तो मेरे घर की ऊपरी मंजिल में एक लड़की रहती थी। वह अच्छे स्कूल में पढ़ती थी। अच्छे कपड़े पहनती थी। नेक दिल थी। मैंने ये सब देखकर कभी अपने माता-पिता से जिद नहीं की कि मुझे भी ऐसा कीजिए। मैंने प्रण लिया कि मैं आगे कुछ करूंगी। आज जिस तरह मैं जी रही हूं, वैसा जीवन मैं अपने बच्चों को नहीं दूंगी। हालात का सामना करने के लिए मैं उसी लड़की के घर में दाई (नौकरानी) का काम करने लगी। धीरे-धीरे मेरी दोस्ती उस लड़की से हो गई और वो मुझे अपने कपड़े पहनने को देने लगी। वह रोज 5 रुपये भी देती। मैं उस पैसे को गुलक में डालती थी। दो साल लगातार काम किया और उस पैसे से अपना नाम लिखवाया। वहां मैं कुछ दिन ही पढ़ी थी तो वहां नाच में भाग लेने का मौका मिला। नाच से वहां मौजूद नेता सुरेन्द्र यादव (मुख्य अतिथि) इतने खुश हुए कि उन्होंने मंच पर मुझे 101 रु. का इनाम दिया। मैंने पैसे पापा को सौंप दिये। उसी पैसे से उन्होंने कुछ काम शुरु किये। हमें आगे पढ़ने के लिए पिताजी कमाने लगे। आज मैं बहुत खुश हूं कि भगवान ने मुझे लड़की रूप में जन्म दिया। मैंने इतनी परेशानी झेली लेकिन मैं भगवान से ये नहीं कहती हूं कि ये अगले जन्म में मुझे लड़की मत बनाना। मैं तो भगवान से अवश्य कहूंगी कि मुझे अगले जन्म में भी लड़की ही बनाना। स्त्री के बिना कुछ भी नहीं। स्त्री ही मां है, वही अर्धागिनी है। बस, इतना कहना चाहती हूं कि हे भगवान, मुझे हर जनम में नारी बनाना लेकिन सभी गुणों से अवश्य भर देना, क्योंकि अगर धन नहीं है, तो किसी भी तरह कमा लूंगी लेकिन गुण न हो, तो न मैं इसे किसी से मांग सकती हूं और न खरीद सकती हूं। गुण बाजार में खरीदा नहीं जा सकता। पैसा कमाया जा सकता है। मुजफ्फरपुर, Jagran 14 Feb 2010
औरतें ही क्यों ढा रही हैं औरतों पर जुल्म?
जन्म के बाद मैंने जब से दुनिया में होश संभाला,तब से घर में हमेशा से लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव का ही अनुभव किया। लगातार निर्देश मिलते हैं -ये मत करो, वो मत करो, लड़कियों की तरह घर में रहो, यहां मत जाओ, वहां मत जाओ, शाम में ज्यादा देर तक बाहर मत रहो। हमेशा यही सब सहती रही। जब तक बच्ची थी, तब तक ये दुनिया बहुत अच्छी लगती थी, पर जब से बड़ी हुई हूं, तब से बस इन सब परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। यहां तक कि पढ़ाई करने के लिए भी मुझे काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा, क्योंकि घर वालों का मानना है कि लड़कियां ज्यादा पढ़कर क्या करेंगी, आखिर उन्हें एक दिन अपने ससुराल ही तो जाना हैं। सब सोचते हैं कि एक तो पढ़ाई में पैसे खर्च करो, फिर एक दिन दहेज का इंतजाम करो। ऐसे में परिवार के लिए तो बेटियां पराया धन होती हैं। परिवार, समाज व अगल-बगल में भी यही देखने को मिलता है। सुबह जब पेपर उठाओ तो ज्यादातर खबरें औरतों पर किए जा रहे अत्याचार पर ही छपती हैं। कहीं लड़कियां दहेज के नाम पर जलायी जाती हैं, तो कहीं औरतों की इज्जत से खिलवाड़ किया जाता हैं। ज्यादातर मामलों में औरतों के द्वारा ही औरतों पर शोषण किया जाता है। मैंने कभी नहीं सुना कि एक ससुर ने अपनी बहू को जला दिया, बल्कि सास-ननद ही हमेशा बहू को जलाती हैं। घर में भी मां अपने बच्चों में भेदभाव करती हैं। वह बेटों को ज्यादा मानती है,आखिर क्यों? क्यों बार-बार औरतों की हर कदम पर परीक्षा ली जाती हैं। आज कोई ऐसी जगह नहीं हैं, जहां औरतें सुरक्षित हैं। बस, ट्रेन, कार्यालय, सड़क- कहीं औरत खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करती है। अगर उनके ऊपर कोई अत्याचार होता हैं तो वे रिपोर्ट लिखाने में भी कतराती हैं, कारण यह है कि थाने में भी उन्हें सुरक्षित नहीं समझा जाता। अगर कहीं ज्यादा देर हो जाती है, तो हम खुद डर का अनुभव करते हैं। आखिर हमारा समाज कब औरतों को बख्शेगा? समाज में कन्या भ्रूण हत्या की जाती हैं, वो कहां तक सही है? बेटे की चाह में लोग बेटियों की हत्या कर देते हैं, जिससे हमारे देश में लड़कियों की संख्या में कमी हो रही है। जब लड़कियां नहीं होंगी, तब क्या करेगा समाज? ये सृष्टि ही खत्म हो जायेगी। व्यवहार में दोहरापन यह है कि एक ओर देश में लड़कियों और औरतों की पूजा की जाती हैं। दूसरी तरफ उन पर अत्याचार किया जाता है। औरतों को दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती आदि रूपों में पूजा जाता है, दूसरी तरफ उन्हें जलाया जाता हैं। शहर में तो शिक्षा के कारण स्ति्रयां बहुत आगे बढ़ रही हैं। वे डाक्टर, इंजीनियर, वित्तीय विशेषज्ञ और न जाने क्या-क्या बन रही हैं। पर ग्रामीण इलाकों में अभी भी औरतों की स्थिति बदतर है। महिलाएं जितनी भी आगे क्यों न बढ़ जाएं, हमेशा उन्हें दुर्बल ही समझता रहेगा। अगर हमें अपने समाज को बदलना है, तो शुरुआत घर से ही करनी पड़ेगी। एक मां को चाहिए कि वो अपनी बेटी को समाज में हक दिलाने के लिए लड़े। लड़कियों को समझाना होगा कि वह वस्तु नहीं, बल्कि व्यक्ति हैं। बेटा-बेटी में भेदभाव रोकना होगा। महिला संगठन, सरकार,सबको आगे आना होगा। जब तक समाज आगे नहीं आयेगा, तब तक कानून भी कुछ नहीं कर पायेगा। अभी हम लड़कियां हैं। कल हम औरत होंगी। एक समय था जब झांसी की रानी आदि वीरांगानाओं ने दुश्मनों से लोहा लिया। आज दहेज प्रथा, बाल विवाह, विधवा, परित्यक्तता समस्या, सतीप्रथा, भ्रूण-हत्या आदि शत्रुओं से जूझना है। हम लड़कियों को इन सब बुराइयों को देश से बाहर निकालना पड़ेगा। हम भविष्य हंै, हम ही हैं जो आने वाले हिन्दुस्तान को बदल सकते हैं।मुजफ्फरपुर, Jagran 15 Feb 2010
Saturday, 13 February 2010
शादी उसी से की जो दहेज लेने के खिलाफ था
लड़की होने के नाते मेरे अच्छे अनुभव ज्यादा हैं। मेरी पढ़ाई में कोई परेशानी नहीं आई। कहीं भी मेरे माता-पिता ने मेरे और मेरे भाई के बीच कोई अंतर नहीं रखा। जब मैं छोटी थी, मुझे बहुत प्यार मिला। जब स्कूल जाने लायक हुई तो अच्छे स्कूल में मेरा नामांकन हुआ। मैं महाविद्यालय तक आई। यहां भी शिक्षक शिक्षिकाएं लड़कियों के साथ भेद-भाव नहीं करते हैं। लड़कियों के लिए भारत सरकार और बिहार सरकार की ओर से ऐसे कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, जिसका लाभ सिर्फ लड़कियों को मिल रहा है। इस पर मुझे खुशी होती है कि मैं भी एक लड़की हूं। अगर मैं लड़का होती, तो मुझे इन सब लाभों से वंचित रहना पड़ता। मैं पढ़ाई के साथ-साथ अपने घर के कामों में अपनी मां की मदद करती हूं, जो कि मेरा भाई नहीं कर सकता। मां कहती है मेरी बेटी ही ठीक है, जो मदद करती है और पढ़ती भी है। मेरी शादी हो चुकी है। जब मैंने अपनी शादी का विरोध किया, तब मेरी मां नहीं मानी। मैंने कहा था, एक ही शर्त पर शादी करूंगी, वह यह कि शादी बिना दहेज के होगी। तब मेरी मां ने बताया कि लड़के ने दहेज लेने से मना कर दिया है और उन्होंने अपने माता-पिता को भी समझाया कि मुझे पैसे से शादी नहीं करनी है। उसने कहा-मुझे लड़की से शादी करनी है। आपको जितना भी पैसा चाहिए, वो मैं कमा के दूंगा लेकिन मैं शादी बिना दहेज के करूंगा। इस पर मुझे खुशी हुई एक समझदार लड़के के साथ मेरी शादी हो रही है। मुझे उस पर गर्व हुआ। इतना ही नहीं, ससुराल में भी मेरी पढ़ाई जारी है। मेरे पति पढ़ाई के बारे में बहुत सजग है। वो मुझे आत्मनिर्भर देखना चाहते हैं। मेरी सासू मां भी मुझे पढ़ने से नहीं रोकती। जब मेरे पति मेरे भाई-बहन को अच्छी से अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, तो मुझे बहुत खुशी होती है। लड़की होने के नाते मेरे अनुभव कुछ बुरे भी हैं। जब मैं कभी अपनी मां को बिना बताये खेलने भी चली जाती, मां गुस्सा करती लेकिन वहीं मेरे भाई पर गुस्सा नहीं करती। लड़की होने के कारण मैं कभी अकेले कहीं भी नहीं जा सकती थी। मां कहती तुम किसी को साथ लेकर जाओ। मुझे बुरा लगता, जब कालेज जाते वक्त मुहल्ले के लोग उपेक्षा की दृष्टि से देखते। जब मैं अपने आस-पास किसी भी लड़की पर अत्याचार होते देखती हूं, तो बहुत डर लगता है।
Friday, 12 February 2010
बेटियों का गर्भ में ही मारने लगे तो बेटा के लिए बहु कहां से लाएंगे।
बिहपुर(नवगछिया), संवाद सूत्र : प्रखंड के रवि मेमोरियल पब्लिक स्कूल में गुरुवार को बिहार पेंशनर समाज की बिहपुर इकाई के बैनर तले कन्या भ्रूण हत्या एक अपराध विषय पर संगोष्ठी का आयोजन हुआ। पेंशनर समाज के अध्यक्ष हरिनारायण झा ने इस मौके पर कहा कि माता के बिना सृष्टि की कल्पना बेमानी है। श्री झा ने कहा कि कन्या भ्रूण हत्या एक संगीन अपराध है। वहीं इस मौके पर प्रखंड सचिव नारायण गोप, उपाध्यक्ष कपिलदेव चौधरी, सुरेश चौधरी, सचिव विवेकानंद चौधरी समेत संयुक्त सचिव राजेन्द्र शर्मा आदि ने कन्या भ्रूण हत्या को सामाजिक कुरीति बताया। संगोष्ठी में भाग लेते हुए मधुसूदन सर्वोदय उच्च विद्यालय प्रबन्ध समिति के दाता सदस्य महंत नवल किशोर दास ने कहा कि अपने देश में नारी को देवी का दर्जा दिया गया है। नारी उत्पीड़न व कन्या भ्रूण हत्या अपराध ही नहीं बल्कि पाप भी है। रवि मेमोरियल पब्लिक स्कूल के प्राचार्य भोलादत्त झा ने लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के दिनोंदिन घटते अनुपात का कारण कन्या भ्रूण हत्या है। अगर इस पर आज ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले भविष्य में हमें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही अगर हम सब बेटियों का गर्भ में ही मारने लगे तो बेटांें के लिए बहु कहां से लाएंगे। उधर बभनगामा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन चौधरी ने कहा कि कन्या भू्रण हत्या की रोकथाम के लिए हमें खुद जागरूक होकर इसे सामाजिक बुराई समझते हुए एकजुटता के साथ भ्रूण हत्या रोकने के लिए सामाजिक पहल करने की जरूरत है। क्योंकि इस सामाजिक बुराई की जड़ खुद है। क्योंकि आज बेटियां हर क्षेत्र में बेटा से पीछे नहीं रही। 12 FEB 2010
लड़कियों में प्रतिभा की कमी नहीं, विश्वास बनाये रखिए
कृति हम सभी जीव-प्राणियों की जन्मदात्री है। प्राणियों में सबसे समझदार होने की वजह से मनुष्य ने एक तरफ अपनी विकास यात्रा के क्रम में प्रकृति को साधने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ समाज निर्माण के नियम-कायदे भी बनाये। हमारा समाज प्रकृति प्रदत्त कम, मानव अनुशासित अधिक है। अन्य प्राणियों में नर-मादा के व्यवहार प्रकृति तय करती है, लेकिन सभ्य समाज में स्त्री-पुरुष के व्यवहार नियमों में बंधे होते हैं। दोनों के बीच यौन संबंध तो प्राकृतिक हैं, लेकिन दोनों की स्थिति समाज तय करता है। समाज उन्हें किस नजर से देखता है, क्या अधिकार प्रदान किए गए हैं, कैसे संसाधन प्रदान करता हैं, उनके कार्य-विभाजन क्या हैं, इन सारी बातों पर स्त्री-पुरुष की स्थिति भिन्न हो जाती है। हमारा समाज चूंकि पितृसत्ता से ग्रसित है इसलिए नियम-कानून, परम्पराएं, रीति-रिवाज पुरुषों के द्वारा, उनकी सुविधानुसार ही बनाए गए हैं। हालत यह है कि स्त्री को केवल इस्तेमाल करने की चीज या सजावट का समान समझकर मर्द उस पर आधिपत्य जमाता आया है। महाभारत का द्रौपदी-चीरहरण इसी मानसिकता का ज्वलंत उदाहरण है। मेरा मानना है कि पुरुष आम तौर पर महिलाओं को किसी चीज में आगे बढ़ने देना नहीं चाहते। विवाहिता के लिए घूंघट करना इसलिए जरूरी बनाया गया कि वह किसी अन्य पुरुष को न देख सके और न कोई दूसरा उसकी ओर आकर्षित हो सके। पाव में घुंघरू और पायल इसलिए होते थे कि जैसे ही वह इधर-उधर जाए, उस पर नजर रखी जाए। खैर, ये महिलाओं को नियंत्रित रखने की योजना (साजिश) थी, जिसे बाद में महिलाओं ने अज्ञानतावश खुद ही अपने साज-श्रृंगार के रूप में अपना लिया। दासता के उपकरण फैशन बन चुके हैं। मैं एक लड़की हूं, शिक्षित हूं, अपने अधिकारों के प्रति सजग हूं। लेकिन इस पितृसत्तात्मक समाज में स्ति्रयोचित गुणों की परिभाषा कुछ और है। लड़की होने के नाते मुझे शर्माना, खाना बनाना, सिलाई-कढ़ाई और अन्य घरेलू कार्यो में निपुण होना चाहिए। अधिक पढ़ाई अगर गलती से कर ली तो भी अपना ध्यान चौका-बर्तन में लगाना होगा। जब शादी की उम्र हो जाए और लड़का मुझसे कम पढ़ा-लिखा हुआ, तो भी वह मेरा देवता और मैं उसकी दासी हूं। अगर उसने मुझे बेवजह मारा-पीटा तो उसके कृत्य को कोसने की जगह इसे मेरे पूर्व जन्मों का पाप बताया जाएगा। वह जो कहे, परंपरा के नाम पर सहन करना पड़ेगा। जैसा कि महिलाओं के साथ होता है, उन्हें शिक्षा के अधिकार, संपत्ति रखने के अधिकार, सेक्स संबंध के अधिकार आदि से वंचित कर दिया जाता है। शिक्षा वर्तमान युग में महिलाओं का सबसे बड़ा हथियार हैं। इसके बल पर वह अपने आप को सशक्त बना सकती है। महिला सशक्तिकरण के लिए सरकारी, गैर-सरकारी संगठन, महिला संगठन आदि बहुत से काम करते दिख रहे हैं। व्यवसायिक और शैक्षणिक आरक्षण देने की पहल भी हुई है, लेकिन रास्ता लंबा है। इससे महिलाओं को रोजगार मिलेगा। उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, लेकिन समाज में उनकी स्थिति सुधारने के लिए इतना ही काफी नहीं है। महिलाओं का जीवन स्तर बेहतर हो, लेकिन केवल इससे समाज की व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं आएगा। यह समाज अचानक मातृसत्तात्मक नहीं हो जाएगा। नारी अपनी शारीरिक-आर्थिक सुरक्षा के लिए पुरुष पर आश्रित है। यौन-उत्पीड़न, बलात्कार जैसी घटनाओं से अपने आप को बचाने के लिए वो सहमी है। सुरक्षा करने वाला वह पुरुष ही तो दूसरी तरफ भक्षक हो जाता है। बड़ा सवाल यह है कि हम अपने को आर्थिक रूप से तो सशक्त कर सकते है लेकिन महिला और पुरुष के भेद को कैसे मिटाएंगे? मैंने भी एक सपना देखा है क्योंकि मैं भविष्य हूं और आजाद समाज में खुला रहना चाहती हूं। हर लड़की को हक है कि वो अपने सपनों को पूरा करे। हम क्या नहीं कर सकती हैं? समाज को हमें बोझ समझने वाली मानसिकता छोड़नी पड़ेगी। लड़की हमेशा सुख में दुख में साथ निभाने वाली है,वो दोस्त है, पत्नी और मां भी है, लेकिन समाज ने उसे हमेशा झुकाने का ही प्रयास किया है। मुझे गर्व है कि मैं एक लड़की हूं, जिससे यह सम्पूर्ण समाज अस्तित्व में हैं। 11 FEB 2010
समाज हमें आखिर किस बात की सजा देता है?
मुझे अपने लड़की होने पर गर्व है। सौभाग्यवश, मैं ऐसे परिवार की हूं, जहां मुझे लड़की होने की वजह से न कभी सजा मिली, न कोई भेदभाव किया गया। मुझे वे सब सुविधाएं मिलीं, जो एक लड़के को मिलती हैं। माता-पिता ने लड़के-लड़कियों में फर्क नहीं समझा। मेरा भी मानना कि हम लड़कियां वह सारे काम कर सकती हैं, जो एक लड़का कर सकता है। रही बात शारीरिक फर्क की, तो यह तो भगवान या प्रकृति का विधान है। अलग-अलग देह प्रकृति की जरूरत भी है, इसकी खूबसूरती भी। गड़बड़ी तो आदमी के बनाये नियम और सोच से पैदा होती है। आज भी हमारे समाज में ऐसे परिवार हैं, जिनका मानना है कि लड़कियां वह नहीं कर सकतीं, जो लड़के कर सकते हैं। अरे, लोग यह क्यों नहीं मानते कि समाज बेटियों पर न विश्वास करता है, न उन्हें समान मौका देता है। आप खुद उसे हिम्मत दें कि हां तुम वह सब कुछ कर सकती हो, तो लड़कियां और बेहतर करती दिखेंगी। अक्सर परिवार वाले कहते हैं कि बेटी है, बाहर नौकरी करने जाएगी तो लोग क्या कहेंगे? लेकिन वे ये क्यों नहीं जानते कि ये समाज उन्हीं लोगों से है। अगर वे ये मान जाएं कि बेटा और बेटी में कोई फर्क नहीं है, तो समाज भी धीरे-धीरे मान जाएगा। ये समाज हमें किस बात की सजा देता है? सब कहते हैं लड़की नौकरी नहीं कर सकती। अपने मन से कुछ नहीं कर सकती। अपने से नीचे या अपने से उच्च जाति के लड़के से शादी नहीं कर सकती। इसमें कुछ पूर्वाग्रह है, कुछ बंदिशें। मैं कहती हूं कि जब ये अधिकार हमें खुद सरकार देने को तैयार है और दे रही है, तो समाज कौन होता है उसे रोकने वाला? हम लड़कियों पर हमेशा दबाव क्यों दिया जाता है कि तुम लड़की हो, लड़की जैसी रहो? क्या लड़की को खुल कर जीने का कोई हक नहीं है? श्रीमती प्रतिभा पाटिल (राष्ट्रपति) औरत होकर जब पूरे देश को चला रही हैं और वे सारे काम कर रही हैं, जो एक पुरुष भी न कर सके, तो स्त्री कमजोर कैसे है? कल्पना चावला, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी ..ये सब महिला ही तो हैं। जब औरत सारे काम कर सकती है, तो फिर लड़कों को ऊंचा दर्जा और लड़कियों को नीचा दर्जा क्यों दिया जा रहा है? दुख की बात है कि इस पुरुष प्रधान देश में आज भी लड़कियों को वह सम्मान नहीं मिल रहा है, जो उसे मिलना चाहिए और जो उसका अधिकार भी है। आज भी लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मारा जा रहा है। दहेज के लिए जलाया जा रहा है। आखिर ये सारे जुल्म हम लड़कियों पर ही क्यों? लड़कों को जन्म से पहले नहीं मारा जाता, क्योंकि वह बड़ा होकर वंश को आगे बढ़ाएगा, मां-बाप की सेवा करेगा, उनका नाम रोशन करेगा और सहारा बनेगा। तो क्या लड़की अपने मां-बाप की सेवा नहीं करती, वह अपने मां-बाप का नाम रोशन नहीं करती? कल्पना चावला के मरने के बाद भी लोग उसे याद करते हैं। बाहर कहीं अगर उसका परिवार निकलता होगा तो कहते होंगे, ये देखो, कल्पना चावल का परिवार है। वह भी तो एक लड़की थी। रही बात वंश बढ़ाने की, तो जब हम लड़कियां ही नहीं होंगी, तो वंश कहां से आएगा? फिर लड़कियों के परिवार को हमेशा लड़कों के परिवार के आगे झुकना क्यों पड़ता है? ये प्रथा पलटी क्यों नहीं जाती? क्यों न लड़के वाले ही दहेज दें? हम बस इतना जानते हैं कि लड़कों से कम नहीं हैं लड़कियां। आज नहीं तो कल, समाज को बदलना ही पड़ेगा। 10 FEB 2010
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