Friday, 12 February 2010
मेरे गाने-हंसने पर डांट और भाई के लिए मां के सपने हजार
जलती बहुएं करें पुकार। बंद करो यह अत्याचार यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि एक सुलगती हकीकत है। दहेज एक सामाजिक कलंक है। जब तक विवाह प्रथा से दहेज की बाध्यता खत्म नहीं होती, लड़की के प्रति या तो दूसरे-तीसरे दर्जे का व्यवहार होता रहेगा या उसका जन्म अमंगल माना जाता रहेगा। यह दहेज प्रथा ही है, जिसके चलते किसी घर में एक से अधिक लड़की पैदा होने से मायूसी छा जाती है। दहेज के खौफ से ही लड़कियों को जन्म लेने से रोक दिया जाता है। भ्रूण हत्या दरअसल दहेज प्रथा की दहशत का शर्मनाक नतीजा है, लेकिन इन दिनों फैशन सिर्फ भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान चलाने का है। यानी, समस्या की जड़ पर हमला करने की अपेक्षा लोग कुछ कसैले फल तोड़ कर क्रांतिकारी दिखना चाहते हैं। मैं भी एक लड़की हूं और सोचती हूं कि आज लड़कियों को हर जगह से बहुत सारी सुविधाएं दी जा रही हैं। सुविधाएं मिलने के बाद भी बहुत सी लड़कियां अनपढ़ रह जाती हैं। कई तो काफी कम उम्र में घर-गृहस्थी संभालने लगती हैं। बारह-तेरह वर्ष में ही शादी हो जाती है। एक कारण तो यह है कि मां-बाप बेटी को हमेशा बेटे से कम समझते हैं। वे शायद भूल रहे हैं कि हमारे देश की बेटियां भी बेटों से कम नहीं। कल्पना चावला, किरण बेदी, सुनीता विलियम्स और प्रतिमा देवी सिंह पाटील आदि भी तो इस देश की ही बेटियां हैं, जिन पर सबको गर्व है। मैं भी एक बेटी हूं और चाहूंगी कि मैं भी कुछ ऐसा करूं कि देश में नाम रोशन हो। समाज को लड़की के नजरिये से देखने पर मैंने ये बातें लिखी हैं। अब मैं अपने बारे में लिख रही हूं। इसमें ऐसा अनुभव भी शामिल है, जिसे याद कर अक्सर मैं रो पड़ती हूं। मेरे दो भाई हैं। मुझे बचपन से संगीत का शौक है। इस तरफ रुझान मेरे पापा-मम्मी ने ही करवाया। जब कभी मैं टीवी पर आडीशन देखती, मुझे लगता कि काश, मैं भी आडीशन (स्वर परीक्षा) देने जाती, मेरा भी सेलेक्शन होता, तो कितना अच्छा रहता। विडंबना यह है कि मुझे जीवन और संगीत का शौक देने वाले मेरे मां-पापा ने मेरे बारे में कभी सोचा ही नहीं कि ये भी किसी मंच पर जा कर कुछ गा सकती है। मेरी मां हर वक्त यही कहती है कि रोहित (छोटा भाई) को आडीशन देने के लिए भेजेंगे। उसका सेलेक्शन जरूर हो जाएगा। मेरी मां ने मेरे बारे में कभी नहीं सोचा। मैं उसके सपने से बाहर थी। इतना ही नहीं, एक दिन जब मैं घर में गाना गा रही थी, मां ने मुझे बहुत डाटा और कहा कि इतना जोर से गाना-गाया जाता है? मैंने पूछा कि मैं जोर से कहां गा रही हूं मां, तो वह बोलीं- जोर से गाओ या धीरे से, हर वक्त गाना जरूरी नहीं है। लड़कियों को गंभीर रहना चाहिए। शांत रहना चाहिए, ज्यादा हंसना नहीं चाहिए। लड़कों से बात नहीं करनी चाहिए। मुझे याद है, मैं जब कभी हंसती भी थी, तो मां मुझे डांटती थी। मैं यह पूछना चाहती हूं कि क्या लड़कियां गा नहीं सकतीं? हंस नहीं सकतीं? लड़कों से बात नहीं कर सकतीं? क्या लड़की को कुछ करने का कोई हक नहीं है? क्या बेटी होना इतना बड़ा अभिशाप है? मां की बात याद आती है, तो मैं रोने लगती हूं। हालत यह है कि मायके में डांट-फटकार कर लड़कियों पर एकतरफा कायदे-कानून थोपे जाते हैं और ससुराल में दहेज के लिए प्रताडि़त करने से लेकर उसकी हत्या तक कर दी जाती है। उसके सपनों की परवाह नहीं की जाती। जब समाज अपनी बहू-बेटियों के साथ ऐसा सुलूक कर रहा है, तो क्या सिर्फ पुरुष की भोग्या बनने के लिए कन्या भ्रूण की हत्या रोकी जानी चाहिए? 07 FEB 2010
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