Friday, 12 February 2010
मां के समर्थन ने बनाया साहसी, अब तोड़नी हैं बंदिशें
अपने उस अनुभव को मैं आज बताने जा रही हूं जो कि आज तक मैंने किसी से न कहा है, न शायद फिर कह ही पाऊंगी। जब मैं इस दुनिया में पहली बार आयी, तो सब कीआंखों में आंसू थे। अगर किसी को अफसोस नहीं था, तो वह इंसान सिर्फ मेरी मां थी। मां का मुझे काफी समर्थन मिला। उसी के बल पर आज मैं साहसी लड़कियों में मानी जाती हूं। मेरी कहानी एक आम लड़की की कहानी है। लड़के-लड़कियों के बीच जो भेद-भाव किया जाता है, उसे मैं दूर करना चाहती हूं। मैं सवाल करती हूं- वे सवाल जो सभी लड़कियों के अंदर होते हैं। क्यूं हमें लड़कों से कम महत्व दिया जाता है? क्यूं बेटियों के जन्म पर आंसू बहते हैं? इन सवालों के जवाब हम स्वयं प्राप्त कर सकते हैं। अक्सर नारी ही नारी पर अत्याचार का माध्यम बनती है। मां ही बेटी पर तरह-तरह की रोक लगाती है। बेटी, यहां-वहां मत जाओ, उससे बात मत करो, आदि आदि। परंपराओं के नाम पर जारी बहुत सारी बंदिशों को हमें तोड़ना ही होगा! समाज को बदलना होगा। हमें प्रत्येक पुरुष में नारी की ज्योति जगानी होगी और प्रत्येक नारी में पुरुष का आत्मविश्वास जगाना होगा। पुरुष-नारी में कोई फर्क नहीं करना चाहिए। मैं आने वाले समय में समाज में व्याप्त इस जड़ता को दूर करने का प्रयास करूंगी। यही मेरा सपना है। मही मांगती प्राण-प्राण में, सजी कुसुम की क्यारी। स्वपन-स्वपन में गूंजे सत्य, पुरुष-पुरुष में नारी!! त्याग सिर्फ लड़कियों के हिस्से क्यों? मैं एक लड़की हूं और जहां तक मैं समझती हूं, लड़की होना कोई पाप नहीं, पर ये समाज सोचने पर मजबूर कर देता है कि तुम बेकार की चीज हो, तुम्हारा कोई अपना वजूद नहीं है। तुम कमजोर निर्बल और असहाय हो। एक लड़की किसी की बहन हो सकती है, किसी की मां बन सकती है, किसी के जीवन में उसकी पत्नी बन सकती है पर उसका कोई अपना अस्तित्व नहीं होता है। वह किसी की पत्नी, मां या बहन के रूप में जानी जाती है। उसकी कोई अपनी पहचान नहीं होती है। जिंदगी में जो भी समर्पण या त्याग की भावना होती है, उसे सिर्फ लड़कियों को सिखाया जाता है कि तुम त्याग की मूर्ति हो। लेकिन मैं इस रूढि़वादी समाज से जानना चाहती हूं कि क्यूं लड़कियां ही त्याग और बलिदान की शूली पर चढ़ाई जाती हैं? हम लड़कियों को समाज में सिर उठाकर चलने की इजाजत नहीं है। हम स्वतंत्रतापूर्वक अपने काम नहीं कर सकती हैं। हर जगह रोक-टोक की जाती है कि तुम एक लड़की हो इसलिए ऐसा मत करो-वैसा मत करो। इससे इज्जत पर आंच आएगी। क्या इज्जत का भार सिर्फ लड़कियों पर है? नहीं, हमें इस सोच को मिटाना होगा। इसके लिए लड़कियों को मानसिक रूप से सशक्त होना पड़ेगा। हम लड़कियां इस समाज की एक अभिन्न अंग हैं। मैं आई.ए.एस. आफिसर बनना चाहती हूं। मुझे मेरे सपने प्रेरणा बनकर हिम्मत देते हैं। मैं किसी से कह नहीं सकती कि मैं क्या करना चाहती हूं। मेरे सपनों की कोई भाषा नहीं है, बस उसकी है मंजिल। मैं एक दिन जरूर दिखा दूंगा कि मैं भी कुछ हूं। मैं सिर्फ एक असहाय लड़की नहीं हूं। मुझमें कुछ कर गुजरने की तमन्ना है, अपनी बदौलत! दुनिया को यह बता देना चाहती हूं कि एक लड़की सब कुछ कर सकती है। मुझे लड़की होने पर गर्व है। 06 FEB 2010
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