Friday, 12 February 2010

बेटियां भी सहारा बनेंगी, उन्हें शिक्षा और आजादी चाहिए

महंथ महादेवनंद महिला महाविद्यालय, आरा के आईए प्रथम वर्ष की छात्रा हूं। मेरा भाई बड़ा है और बहन मुझसे छोटी है। मेरे पापा लकड़ी का काम करते है। उनकी कमाई से ही हमें घर चलाना पड़ता है। मैं पढ़-लिख कर पुलिस अफसर बनना चाहती हूं। मुझमें हौसला है कि पढ़ कर कुछ कर दिखाऊं, माता-पिता का नाम ऊंचा करूं। दूसरी तरफ लोग कहते है कि लड़की कुछ नहीं कर सकती। वह केवल घरेलू काम करेगी और खाना पकाएगी। क्या लड़कियां इसीलिए होती हैं कि उन्हें जन्म देकर एक नर्क की जिन्दगी जीने के लिए छोड़ दिया जाए? मैं अपने मम्मी-पापा का भविष्य हूं। मैं जितना पढ़ना चाहती हूं, पढ़ाया जाए और मंजिल तक पहुंचने में सहायता की जाए। अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं ताकि दुनिया आगे जाकर मुझे ताना ना मारे कि ये लड़की पढ़ी-लिखी नहीं है। कोई न कहे कि इसे कुछ नहीं आता (यानी, यह किसी पर बोझ है)। अपने इस इरादे पर मम्मी-पापा की बेरुखी नहीं देख सकती। मैं चाहती हूं कि मम्मी-पापा और भाई-बहनों के सपनों को पूरा करूं। वे लोग दु:ख काटें, यह मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। हम लड़कियां भी लड़कों की तरह नौकरी कर सकती हैं। मैं अपनी पारिवारिक समस्याओं को समझती हूं और यथासंभव हल भी निकाल लेती हूं। इस बदलते जमाने में पढ़ाई बहुत जरूरी है। मैं चाहती हूं कि हर लड़की पढ़े। लड़की ही बड़ी होकर नारी बनती है। देश में कभी नारियों की पूजा की जाती थी। नवरात्र में कन्या पूजन का प्रचलन तो आज भी है, लेकिन उन्हें वाजिब हक नहीं दिये जाते। आजकल नारियों को अपने हक के लिए लड़ना पड़ता है। मेरा यह विश्वास है कि दुनिया की हर नारी स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहती है। बंदिश में नहीं बंधना चाहती। जिस प्रकार बेटा अपने माता-पिता का सहारा होता है। उसी प्रकार बेटियां भी अपने माता-पिता का सम्मान होती है। जिस घर में बेटियां होती हैं, उस घर खुशियां रहती हैं। लेकिन लड़कियों पर इतनी बंदिशें लगाई जाती हैं कि वे अपने अरमानों को दबा देती हैं। मैं चाहती हूं कि बेटियों पर बेवजह बंदिशें नहीं लगाई जाएं, ताकि वह सपनों को छू सके। इसके विपरीत देखती हूं कि आस-पड़ोस की लड़कियां घर के काम भी करती हैं और घरवालों के ताने भी सुनती हैं। मैं लड़कों की तरह अपने माता-पिता का सहारा बनना चाहती हूं और चाहती हूं कि सारी लड़कियां मेरी तरह अपने माता-पिता का सहारा बनें। केवल लड़कों की तरह आजादी पाना और कपड़े पहनना नहीं चाहती, बल्कि उनकी तरह परिवार का दायित्व भी निभाना चाहती हूं। इस नजरिये से ही लड़का-लड़की के प्रति समानता का भाव आयेगा। मैं एक लड़की हूं और चाहती हूं कि जिन माताओं के गर्भ में लड़कियां पल रही हैं, वो उनको न केवल जीवन प्रदान करें, बल्कि उन्हें पढ़ा-लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक भी बनायें। स्त्री-पुरुष अनुपात ठीक करने के नाम पर कन्याओं को केवल ब्याहे जाने के लिए पैदा किया जाना भी स्त्री का अपमान ही है। जरूरी तो यह है कि उन्हें भी लड़कों की तरह स्वतंत्र, शिक्षित और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व गढ़ने दिया जाए। तभी लड़कियां भी मां-बाप के लिए बुढ़ापे का सहारा बन सकेंगी। तब उनके जन्म पर कोई उदास नहीं होगा। 08 FEB 2010

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